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Monday, November 3, 2014

जमाअत-ए-इस्लामी का अपराध


इसमें कोई दो राय नहीं कि जमाअत-ए-इस्लामी का ये अपराध है कि इसने बंग्लादेश बनाने का विरोध किया और ये उसकी अपनी उस विचारधारा की वजह से था, जो इसने राष्ट्रवाद के खिलाफ तैयार की थी और जिसकी वजह से इसने शुरुआत के दिनों में पाकिस्तान बनाने का भी विरोध किया था. लेकिन बाद में इसका समर्थन कर दिया था.
राष्ट्रवाद के विरोध में जमाअत-ए-इस्लामी अकेला संगठन नहीं था. बीसवीं सदी में जब मुस्लिम राज्य का पतन हो गया तो सारी दुनिया में मुस्लिम राज्य की स्थापना के लिए कई आन्दोलन खड़े हुए और उन सभी आंदोलनों ने राष्ट्रवाद का विरोध किया और एक वैश्विक इस्लाम का नज़रिया बनाया, जिसमें ज़्यादातर आन्दोलन फेल हो गए, लेकिन इस्लामी राज्यों के बीच में सहयोग के लिए अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनने लगे जिसमें आर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक कांफ्रेंस और अरब लीग प्रमुख हैं.

इस्लामी राज्य और राष्ट्रवाद में सीधा टकराव कभी भी नहीं बताया गया बल्कि मुस्लिम ब्रदर के संस्थापक हसन अल बनना ने राष्ट्र को इस्लाम का अंग बताया था. साथ ही उन्होंने भाषाओं के बारे में भी यही बात कही. जमाअत-ए-इस्लामी के संस्थापक अबुल आला मौदूदी ने उर्दू के अलावा भाषाओं के खिलाफ या उनके भाषाई राष्ट्रीयताओं के खिलाफ थे. ऐसा कहीं नहीं पाया जाता, लेकिन इतना ज़रूर है कि बंगलादेश की त्रासदी में दक्षिण एशिया में वर्चस्व की जंग में जुटे भारत और पाकिस्तान का पूरा योगदान है.

अगर सन 1947 में ही बांग्लादेश को एक अलग देश घोषित कर दिया जाता तो क्या भारत अलग बांग्लादेश का समर्थन करता? कभी नहीं करता! इसी वर्चस्व की लड़ाई में कश्मीर नाम का इलाका पिस रहा है, जहाँ पाकिस्तान परदे के पीछे बांग्लादेश में अपनी हार का बदला ले रहा है. राष्ट्रवाद अपने आप में इस टकराव को जन्म देता है.

जमाअत-ए-इस्लामी की इस समझ के मुताबिक़ शायद 1947 में बंटवारा होता ही नहीं और एक विशाल हिन्दुस्तान बनता. लेकिन जाहिर है कि राजनीति तमन्नाओं का नाम नहीं है.
मौदूदी की किताब अल-जिहाद फिल इस्लाम में इस्लामी राज्य में गैर-मुस्लिम नागरिकों के अधिकारों पर लिखा है, जिसमें उन्होंने मंदिर बनाने, पूजा करने, स्कूल बनाने, अपनी भाषा में शिक्षा समेत तमाम अधिकारों की बात की है.

लेकिन ये कोई नई बात नहीं थी. मौदूदी ने वही दुहराया जो पुरानी किताबों में अरबी फ़ारसी में लिखा पड़ा है.
सवाल ये है कि 1971 की घटना में जो लोग मरे क्या वो सब के सब आवामी लीग के कार्यकर्ता  थे? क्या उसमें अन्य लोग नहीं मारे गए? क्या उसमें उर्दू बोलने वाले बिहारी मुसलमानों का दमन नहीं किया गया? क्या उनकी औरतों का बलात्कार नहीं किया गया? और आज भी उर्दू बोलने वाले बिहारी मुसलमान दोयम दर्जे के नागरिक बन कर रह रहे हैं, क्या इस पर भी चिंता की ज़रूरत है ?

ये घटनायें एक असामान्य और राजनितिक थीं, जिसमें पाकिस्तान, बांग्ला अवाम और भारत के साथ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भी शामिल था. जिन हत्याओं और बलात्कार के लिए एक से ज्यादा देशों के लोगों पर आरोप हों, उसके के लिए मुक़दमा एक अंतर्राष्ट्रीय अदालत में ही चलाया जाना चाहिए था.
मुख्य सवाल यहाँ ये है कि जिन घटनाओं को लोग पूरे विश्वास के साथ जमात इस्लामी पर मढ़ रहे हैं, और इसके आड़ में जमाअत-ए-इस्लामी और अन्य मुस्लिम संगठनों को अपराधी क़रार देने पर तुले हैं. उनके लिए क्या ये ज़रूरी नहीं हैं कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, मानव अधिकार संगठनों की रिपोर्टों को भी सामने रखा जाय. एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वाच की कई रिपोर्टों ने बांग्लादेश के वार ट्रिबुनेल पर जायज़ सवाल उठाये हैं.

अब इन्हें जमाअत-ए-इस्लामी का सदस्य न कह दें, इसलिए उन लोगों के बयान भी देखने चाहिए, जिन्होंने इन घटनाओं का गहराई से खुद जाकर जायजा लिया है.

रिचर्ड सेस्सोन और लियो रोज़ ने अपनी कैलिफोर्निया विश्विद्यालय से छपी अपनी पुस्तक War and Secession Pakistan, India, and the Creation of Bangladesh में जो वर्णन दिया है क्या उसे मीडिया वाले कूड़ेदान में डाल देंगे? 2011 में शर्मीला बोस की कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस से Dead Reckoning: Memories of the 1971 Bangladesh War नाम की विवादित किताब लिख कर हलचल मचा दी थी.
उन्होंने अवामी लीग द्वारा किये जा रहे जमात विरोधी दावों को चैलेंज किया था. दुनिया भर में बांग्लादेश के कथित वार ट्रिबुनेल के खिलाफ जायज़ आपत्तियां की गई हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि मीडिया ने तय कर लिया है कि अवामी लीग दूध की धुली हुई है और जमाअत-ए-इस्लामी का जन्म सिर्फ जंगी अपराध करने के लिए हुआ था.

पाठकों के लिए बांग्लादेश में जंगी अपराध के खिलाफ दूसरा पक्ष समझने के लिए निम्न लिखित लेखों की लिस्ट दी जा रही है जो जमाअत-ए-इस्लामी या उनके सदस्यों ने नहीं तैयार की है. इसमें अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार संगठन हैं. कई देशों की सरकारें हैं. कई अकादमिक हस्तियाँ हैं. कई डिप्लोमेट हैं. जिसमें उन घटनाओं के बारे में अवामी लीग के प्रोपगंडा अभियान के अलावा दूसरी तस्वीर देखने को मिल सकती है.

Aisha Rahman (28 December 2012), A tribunal exposed: leaked correspondence suggests a “disturbing pattern” that risks a miscarriage of justice, http://opendemocracy.net/opensecurity/aisha-rahman/tribunal-exposed-leaked-correspondence-suggests-disturbing-pattern-that-ri

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 (3 March 2012) Bangladesh war crimes tribunal: further bias is no answer,
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