मेरी क़लम - Meri Qalam - میری قلم ...

Sunday, January 19, 2014

फौजी चाचा की ईमानदारी को सलाम

आज दिल्ली से लौटते वक़्त ट्रेन में अपनी सीट ढूंढ कर कुछ देर बैठा ही था की मोबाइल का अलार्म बजने लगा, ये मगरिब की नमाज़ का रिमाइंडर था !
उठ कर वाशरूम गया और वज़ू किया, सीट पर आकर मगरिब और ईशा (कसर) पढ़ी, फिर लैपटॉप ऑन कर के अपना पेंडिंग वर्क निपटाना शुरू किया !
तक़रीबन एक घंटें के बाद अचानक मैंने अपना जेब टटोला तो ऑलमोस्ट होश उड़ गए, पर्स जेब में नहीं था... ! सभी जेब चेक किये, बैग में भी देखा... पर पर्स नहीं मिला...! इन्ना लिल्लाहि वा इन्ना इलय्ही राजिऊन पढ़ लिया ! अचानक ख़याल आया की वज़ू करते वक़्त पर्स वाशरूम में रखा था !
बहुत स्पीड से वाशरूम की तरफ गया, पर वहां जा कर और ज़्यादा उदास हो गया, क्यूंकि जहाँ पर्स रखा था वो जगह ख़ाली थी !
वापस अपनी सीट पर लौट रहा था तो मुझे परेशान देख कर एक पेसेंजेर ने पुछा "क्या हुवा" !
मैंने बताया ऐसा हो गया है... !
तो उन्होंने वहां बैठे 4-5 पसेंजेर्स के ग्रुप की तरफ मुखातिब हो कर कहा "ये वही हैं शायद" !
उस ग्रुप ने मुझ से नाम और पूरी तफ्सीलात पूछी... !
फिर अचानक एक बुज़ुर्ग से पेसेंजेर ने मुझे अपना पर्स दिखाते हुवे कहा "क्या ये है"?
वो लम्हा कैसा था, शायद लिख भी नहीं सकता ! बस... मुझे अपने अंदर ठाठे मारता हुवा ख़ुशी का 1 समंदर महसूस हो रहा था !

तभी उनके नज़दीक बैठे 1 पेसेंजर ने मुझ से कहना शुरू किया:
ये पर्स इन बुज़ुर्ग फ़ौजी चाचा की बदोलत तुम्हे मिला है, इसमें इन्होनें टेलीफोन नंबर्स भी ढूंढें, और कॉल भी लगाया, एक फ़ोन उन्होंने मेरे दोस्त के नंबर पर लगाया था जो पर्स में रखे उनके विसिटिंग कार्ड में लिखा हुवा था, और दूसरा मेरे वालिद ए मोहतरम को जो नम्बर मेरे ड्राइविंग लाइसेंस पर था !
दोस्त को कॉल पर सब बता दिया था, पर ड्राइविंग लाइसेंस पुराना होने की वजह से वालिद ए मोहतरम का मोबाइल नंबर धुंधला था इस वजह से फ़ौजी चाचा 8 की जगह 0 समझ के कॉल ट्राई कर रहे थे !
उन्होंने कहा अगर तुम नहीं मिलते तो हम तुम्हारा पर्स मथुरा रेलवे स्टेशन पर जमा करा देते !

उन्होंने पर्स मेरे हाथ में थमा दिया और कहा बेटा तुम्हारे पर्स का सामान वैसा ही है, पैसे वगेरह चेक कर लो.... मैं ये सुनकर कंपकापते हुवे उनके गले लग गया !

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