मेरी क़लम - Meri Qalam - میری قلم ...

Monday, December 23, 2013

मानवता

ऐ मानवता तू देख भी रही है, सुन भी रही है, समझ भी रही है !
फिर भी अत्याचारों पर चुप क्यूँ है, बोलती क्यूँ नहीं, तू चुप क्यूँ है ?
मेरा दर्द और उसका दर्द एक ही है महसूस तो कर !
मैं और वो दोनों भारतवर्षी, केह तो दे तू चुप क्यों है ?
सिसकते तन उलझते मन पागल करते हैं मुझ को !
कहाँ गया तेरा एहसास तू चुप क्यूँ है ?
बिलखते चेहरे सहमते दिल उदास दिन !
कहाँ है तेरे वो जज़्बात तू चुप क्यूँ है ?
देख ले सिसकते बच्चे, जवान और बूढ़े नर नारी !
कहते हैं हम हिन्दुस्तानी, पर तू चुप क्यूँ है ?
हमने देखी रोती आँखे और आराम से सोती आँखे !
ज़मीर है अपना शर्मिंदा, पर तू चुप क्यूँ ??
अब बोल भी दे बतला भी दे, तू चुप क्यूँ है ????

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