मेरी क़लम - Meri Qalam - میری قلم ...

Friday, March 1, 2013

ख़लीफ़ा ए वक़्त हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़िअल्लाह) का खोफ़


हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ी) की बीवी (आतिका) कहती हैं की, उमर (रज़ी) बिस्तर पर सोने के लिए लेटते तो नींद ही उड़ जाती थी, बैठ कर रोना शुरू कर देते थे ! मैं पूछती थी ए अमीरुल मूमिनीन क्या हुवा ?
वो कहते थे: “मुझे मुहम्मद (स.अ.व.) की उम्मत की खिलाफत मिली हुई है, और उनमें मिस्कीन भी हैं, ज़ईफ़ भी हैं, यतीम भी हैं, और मज़लूम भी, मुझे दर लगता है अल्लाह तआला मुझ से उन सब के बारे में सवाल करेंगे ! मुझ से जो कोताही हुई तो मैं अल्लाह और उसके रसूल (स.अ.व.) को क्या जवाब दूंगा ?”
सय्य्दना उमर (रज़ी) कहते थे “ अल्लाह की क़सम, अगर दजला के दूर दराज़ इलाके में भी किसी खच्चर को राह चलते ठोकर लग गयी तो मुझे डर लगता है कहीं अल्लाह तआला मुझ से ये सवाल ना कर दें की ए उमर, तूने वोह रास्ता ठीक क्यूँ नहीं कराया था ?

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